Gham Ho Gae Be-Shumaar, Aaqa Lyrics

Gham Ho Gae Be-Shumaar, Aaqa Lyrics




ग़म हो गए बे-शुमार, आक़ा !

बंदा तेरे निसार, आक़ा !


बिगड़ा जाता है खेल मेरा

आक़ा ! आक़ा ! संवार, आक़ा !


मंजधार पे आ के नाव टूटी

दे हाथ कि हूं मैं पार, आक़ा !


टूटी जाती है पीठ मेरी

लिल्लाह ! ये बोझ उतार, आक़ा !


हल्का है अगर हमारा पल्ला

भारी है तेरा वक़ार, आक़ा !


मजबूर हैं हम तो फ़िक्र क्या है

तुम को तो है इख़्तियार, आक़ा !


मैं दूर हूं, तुम तो हो मेरे पास

सुन लो मेरी पुकार, आक़ा !


मुझ सा कोई ग़म-ज़दा न होगा

तुम सा नहीं ग़म-गुसार, आक़ा !


गिर्दाब में पड़ गई है कश्ती

डूबा डूबा, उतार, आक़ा !


तुम वो कि करम को नाज़ तुम से

मैं वो कि बदी को अ़ार, आक़ा !


फिर मुँह न पड़े कभी ख़िज़ाँ का

दे दे ऐसी बहार, आक़ा !


जिस की मरज़ी ख़ुदा न टाले

मेरा है वो नाम-दार आक़ा


है मुल्क-ए-ख़ुदा पे जिस का क़ब्ज़ा

मेरा है वोह कामगार आक़ा


सोया किये ना-बकार बंदे

रोया किये ज़ार-ज़ार आक़ा


क्या भूल है इन के होते कहलाएं

दुन्या के ये ताजदार आक़ा


उन के अदना गदा पे मिट जाएं

ऐसे ऐसे हज़ार आक़ा


बे-अब्र-ए-करम के मेरे धब्बे

'ला तग़्सिलुहल-बिह़ार', आक़ा !


इतनी रह़मत रज़ा पे कर लो

'ला यक़रुबुहुल-बवार', आक़ा !

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